आज बनाई फेरहिस्त
क्या क्या किया बाबा ने हमारे लिए..
हाँ असम्भव सा है ये
कि जैसे सागर को ओक में समेट लेना
पर भोला सा प्रयास किया
कि उनकी ही उँगली पकड़ कर चलना सीखा
उन्हीं के कांधे पर ही बैठ मेला घूमे
झूले पर बैठ क्षितिज छुआ..
जब हम रोये तो उन्ही ने जतन कर के हँसाया
स्कूल का होमवर्क कराया
रात नक्षत्रों की पहचान कराई
दिन आसमान में उड़ना सिखाया
बुखार में रात रात पट्टी रखी
दौड़ते फिरे डॉक्टरों के द्वार
माँ की मानी मन्नतें पूरी कीं..
दफ्तर से घर आते हुए ले कर आये
समोसे कचौड़ी जलेबी
मुस्कुराते हुए रिपोर्ट कार्ड पर दस्तखत किए
साईकल से स्कूटर फिर कार
जिंदगी पर सवारी करने के पहिये थमाए
जिंदगी समेट ली हमारी हँसी में..
कहा नहीं कभी कि प्यार है परवाह है
पर पग पग पर जताया
खुद न पूछा हालचाल
पर माँ से जानते रहे
हर दिन हर हाल
कोई दिक्कत तो नहीं न
कॉलेज में सब ठीक है न..
नौकरी की परेशानियाँ अपने अनुभवों से समझाते सुलझाते रहे..
कि वो वक्त की नदी बने
हम उन पर सवार नाव थे
वो खेते रहे
हम बढ़ते रहे..
वो वचनबद्ध थे
हमारी अच्छी परवरिश के लिए
हमें खुशहाल देखने के लिए..
पर इस बोझिल सफर में वो थके नहीं
हँसते खिलखिलाते रहे..
कि उनका हँसना उजास रही घर की..
कि हमें सब याद है बाबा
कि हमें बनाने में तुम
कितना खटे
कितना मिटे
रोम रोम शुक्रिया कह रहा है..
ये दुख ये तकलीफ
बस तुम्हें छू कर गुज़र जाए
तुम्हारी हँसी महके
बस यही तमन्ना है..
जन्मदिन शुभ हो...




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