प्यार कैसे होता है

प्यार कैसे होता है


 प्यार/शायक आलोक

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शेजवान प्रॉन फ्रायड राईस के साथ

प्रॉन मंचूरियन खा कर

रॉकी बाल्बोआ की तीसरी मूवी देखना

और कहना तुमसे

सो जाओ तुम कि सर्दी है तुम्हें

मैं नापा करूँगा तुम्हारे सीने का तापमान हर पैंतालिसवें मिनट

यही तो होता है न प्यार !?


या प्यार जरूर वह रहा होगा

जब उनींदी तुम महालया सुनती थी फ़ोन पर

तुम्हारे पिता तेज रखते थे टीवी की आवाज़

और उस धार्मिक लम्हे में मैं

और जोर से मेरी नाक तुम्हारी पीठ पर टिका देता था

तुम मेरे बाल जोर से खींच लेती थी.


शायद प्यार वह भी था

हफ्ते के कमोबेश तीन रोज

तुम्हारे लौटने से पहले

धो देना तुम्हारे हिस्से के जूठे बर्तन

बाल्टी से निकाल कर निचोड़ देना

तुम्हारी बासी कैप्री/टीशर्ट

तुम्हारे लिए दरवाजा खोलने से पहले रोज

एफ़ एम् ट्यून कर तुम्हारा कोई पसंदीदा

नया फ़िल्मी गाना बजा देना.


प्यार ही तो था तुम्हारे जाने के बाद

तुम्हारे बचे रह गए सामानों से लिपट कर रोना

दिसंबर की सर्दियों में रोज सर को भिंगोना तीन बार

गार्नियर के कंडिशनर की गंध को

रुमाल में बसा कर रखना. 


आजकल प्यार-श्यार को नहीं मानने वाली तुम

कहती हो वक़्त भर देगा मेरे जख्म

इन्हीं कुछ महीनों में

और मैं कहता हूँ

तुम्हारी दी हुई लीवायस टीशर्टों, प्रो-वोग जूते

यार्डली-टेम्पटेशन डियोडेरेंट को खपाने में ही बरस गुजरेंगे..

ये दुख ये तकलीफ

ये दुख ये तकलीफ


 आज बनाई फेरहिस्त

क्या क्या किया बाबा ने हमारे लिए..

हाँ असम्भव सा है ये

कि जैसे सागर को ओक में समेट लेना

पर भोला सा प्रयास किया

कि उनकी ही उँगली पकड़ कर चलना सीखा

उन्हीं के कांधे पर ही बैठ मेला घूमे

झूले पर बैठ क्षितिज छुआ..


जब हम रोये तो उन्ही ने जतन कर के हँसाया

स्कूल का होमवर्क कराया

रात नक्षत्रों की पहचान कराई

दिन आसमान में उड़ना सिखाया 

बुखार में रात रात पट्टी रखी

दौड़ते फिरे डॉक्टरों के द्वार

माँ की मानी मन्नतें पूरी कीं..


दफ्तर से घर आते हुए ले कर आये

समोसे कचौड़ी जलेबी

मुस्कुराते हुए रिपोर्ट कार्ड पर दस्तखत किए

साईकल से स्कूटर फिर कार 

जिंदगी पर सवारी करने के पहिये थमाए 

जिंदगी समेट ली हमारी हँसी में..


कहा नहीं कभी कि प्यार है परवाह है

पर पग पग पर जताया

खुद न पूछा हालचाल

पर माँ से जानते रहे

हर दिन हर हाल

कोई दिक्कत तो नहीं न

कॉलेज में सब ठीक है न..

नौकरी की परेशानियाँ अपने अनुभवों से समझाते सुलझाते रहे..

कि वो वक्त की नदी बने

हम उन पर सवार नाव थे

वो खेते रहे

हम बढ़ते रहे..


वो वचनबद्ध थे

हमारी अच्छी परवरिश के लिए

हमें खुशहाल देखने के लिए..

पर इस बोझिल सफर में वो थके नहीं

हँसते खिलखिलाते रहे..

कि उनका हँसना उजास रही घर की..


कि हमें सब याद है बाबा

कि हमें बनाने में तुम

कितना खटे

कितना मिटे

रोम रोम शुक्रिया कह रहा है..


ये दुख ये तकलीफ 

बस तुम्हें छू कर गुज़र जाए

तुम्हारी हँसी महके

बस यही तमन्ना है..


जन्मदिन शुभ हो...

बुक फेयर दिल्ली

बुक फेयर दिल्ली


 जब आपसे बुक फेयर में मिली तो आपको बस गांव के बच्चों का पुस्तकालय चलाती उनके लिए तमाम खुशियां बटोरती सैंटा के रूप में गले मिली थी।

कौन कहता है प्रेम लौटकर नहीं आता। उन अजाने बच्चों के लिए भेजा गया मेरा मुट्ठी भर  प्रेम अपने भव्य रूप में वापस आया है।

गिनती के शब्दों ने अनगिन मोती रख दिये आँखों की कोरों पर। पहली बार किसी ने इतना-इतना लाड़ किया है जितना अपनी उम्र में भी कभी नहीं मिला। 


बार बार इस लाइन को पढ़ रही


"जी चाहता है तुम्हें गले से लगाकर देर तक सहलाती रहूँ, तुम बच्चों सी ज़िद और फरमाइशें करो मुझसे जैसे कोई पाँच साल का बच्चा करता है और मैं कभी हँसते हुए तो कभी आँखें तरेरते हुए तुम्हारी वो ज़िदें पूरी कर सकूँ। कभी मुझे अपने लाड़ उठाने का मौका देना गुड़िया।"


किसी को नहीं पता मगर मेरा बचपन इतना विद्रूप रहा कि ये सब सुनने, महसूस करने को तरसता है जी। कुछेक लोगों से कहा भी है कि आपका हाथ अपने सर पर महसूस करने का मन है। गले लगने का मन है देर तलक। बस इतना सिर्फ़ इतना ही चाहिए मुझे किसी से।

ऐसे में आपका ये लिखना ....आप कभी मिलीं फिर से तो बताऊँगी कि आपने मुझे क्या दिया है दी।


अब आप संगम संग्राम शबनम शलगम कुछ भी कहो चलेगा।

जब आप कहती हो न कि तुम तो जानती हो तुम्हारी दीदी कितनी अनपढ़ है तो लगता है आपको कसके गले लगा लूँ 

सच! आपने जितना पढ़ा है मैंने उसका आधा भी नहीं पढ़ा होगा।


पसंदीदा किताबें तो ठीक हैं मगर ये जो एंटीक पोस्टकार्ड डायरी है न इसमें कुछ अच्छा सा लिखूँगी ।

पता है मोटो! परसों से ही ये मछली पहन के घूम री मैं। पहनते ही फट्ट से फोटो भी ले ली। बच्चों सी इतरा री।

चाह री कोई पूछे इनके बारे में और इठला के कहूँ ....भेजे हैं किसी ने। 

उसकी ओर देख जोर से चिल्लाऊं- कहूँ कि देखो मैंने तुम्हारा लिखा बदल दिया है।


गाना चल रा बैकग्राउंड में

एक तू ही धनवान सरगम.....

(गोरी नइँ काये कि अपन सांवले हैं तो झूठ नइँ बोलने का...)

मुझे लगता है कि

मुझे लगता है कि


मुझे लगता है की हम सब ना घर की तलाश में है। ऐसा घर जहां छत तो होगी मगर दीवारें नहीं होंगी। और ये घर की तलाश ही है जो हमें नए-नए शहर घूमने पर मजबूर करती है।हम भटकते हैं, कभी गलियों में, कभी बाजारों में, बस इस उम्मीद में की कहीं कोई घर खाली मिल जाए। कई जगह हमें बहुत अपनापन मिलता है, कई गलियां है जो बहुत अपनी लगती हैं। इन गलियों में भटकना किसी सुहाने सफर जैसा लगता है। हर सफर के बाद हम इन गलियों में अपने दिल का कुछ हिस्सा छोड़ते चलते हैं,  और लिए चलते हैं अपने साथ इन गलियों की फोटो जो की हम घर मिलने के बाद दीवारों पर टांग सकेंगे।


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