जब आपसे बुक फेयर में मिली तो आपको बस गांव के बच्चों का पुस्तकालय चलाती उनके लिए तमाम खुशियां बटोरती सैंटा के रूप में गले मिली थी।
कौन कहता है प्रेम लौटकर नहीं आता। उन अजाने बच्चों के लिए भेजा गया मेरा मुट्ठी भर प्रेम अपने भव्य रूप में वापस आया है।
गिनती के शब्दों ने अनगिन मोती रख दिये आँखों की कोरों पर। पहली बार किसी ने इतना-इतना लाड़ किया है जितना अपनी उम्र में भी कभी नहीं मिला।
बार बार इस लाइन को पढ़ रही
"जी चाहता है तुम्हें गले से लगाकर देर तक सहलाती रहूँ, तुम बच्चों सी ज़िद और फरमाइशें करो मुझसे जैसे कोई पाँच साल का बच्चा करता है और मैं कभी हँसते हुए तो कभी आँखें तरेरते हुए तुम्हारी वो ज़िदें पूरी कर सकूँ। कभी मुझे अपने लाड़ उठाने का मौका देना गुड़िया।"
किसी को नहीं पता मगर मेरा बचपन इतना विद्रूप रहा कि ये सब सुनने, महसूस करने को तरसता है जी। कुछेक लोगों से कहा भी है कि आपका हाथ अपने सर पर महसूस करने का मन है। गले लगने का मन है देर तलक। बस इतना सिर्फ़ इतना ही चाहिए मुझे किसी से।
ऐसे में आपका ये लिखना ....आप कभी मिलीं फिर से तो बताऊँगी कि आपने मुझे क्या दिया है दी।
अब आप संगम संग्राम शबनम शलगम कुछ भी कहो चलेगा।
जब आप कहती हो न कि तुम तो जानती हो तुम्हारी दीदी कितनी अनपढ़ है तो लगता है आपको कसके गले लगा लूँ
सच! आपने जितना पढ़ा है मैंने उसका आधा भी नहीं पढ़ा होगा।
पसंदीदा किताबें तो ठीक हैं मगर ये जो एंटीक पोस्टकार्ड डायरी है न इसमें कुछ अच्छा सा लिखूँगी ।
पता है मोटो! परसों से ही ये मछली पहन के घूम री मैं। पहनते ही फट्ट से फोटो भी ले ली। बच्चों सी इतरा री।
चाह री कोई पूछे इनके बारे में और इठला के कहूँ ....भेजे हैं किसी ने।
उसकी ओर देख जोर से चिल्लाऊं- कहूँ कि देखो मैंने तुम्हारा लिखा बदल दिया है।
गाना चल रा बैकग्राउंड में
एक तू ही धनवान सरगम.....
(गोरी नइँ काये कि अपन सांवले हैं तो झूठ नइँ बोलने का...)




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